Monday, December 16, 2019 1:14 PM
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जरूरत से ज्यादा मल्टी-विटामिन्स से हार्ट संबंधी बीमारी का खतरा

शरीर में ज़रूरी तत्व और विटामिन्स की कमी है, तो उसे मल्टी-विटामिन्स के ज़रिए पूरा किया जाता है, लेकिन अब जो बात सामने आई है उस पर गौर करें तो मल्टी-विटामिन्स से हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

जर्नल ऑफ अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में पब्लिश हुई एक रिसर्च के मुताबिक, जब बात हार्ट संबंधी बीमारियों को रोकने की आती है तो हेल्थ सप्लिमेंट्स का या तो बेहद कम असर होता है या फिर वे बेअसर होती हैं। वहीं कुछ हार्ट संबंधी बीमारियों के रिस्क को बढ़ा देती हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि इन निष्कर्षों का भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने वाला है क्योंकि बीते कुछ सालों में भारत में हेल्थ सप्लिमेंट्स का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा है। यहां लोग या तो खुद ही हेल्थ सप्लिमेंट्स का प्रयोग करते हैं या फिर डॉक्टर ही उन्हें प्रस्क्राइब करते हैं। Fortis C-Doc के चेयरमैन डॉ. अनुप मिश्रा ने बताया कि लोग अपने शरीर में कुछ ज़रूरी तत्वों की कमी पूरी करने के लिए खुद ही हेल्थ सप्लिमेंट्स लेने लगते हैं और कई बार डॉक्टर ही उन्हें लेने की सलाह देते हैं।

2012 के राष्ट्रीय आंकड़ों से पता चला है कि अमेरिका में 52 पर्सेंट आबादी ये सप्लिमेंट्स लेती है। 31 पर्सेंट आबादी मल्टी-विटामिन लेती है, जबकि 19 पर्सेंट आबादी विटामिन डी, 14 पर्सेंट आबादी कैल्शियम तो वहीं 12 पर्सेंट आबादी विटामिन सी लेती है।

कैंसर और न्युट्रिशन डेटा को लेकर रिसर्च करने वाली यूरोपियन प्रॉस्पेक्टिव इन्वेस्टिगेशन कंपनी के आंकड़ों से भी यह बात ज़ाहिर हुई कि वहां कि आबादी भी सप्लिमेंट्स लेती है, जैसे कि डेनमार्क में 51 पर्सेंट पुरुष तो 66 पर्सेंट महिलाएं सप्लिमेंट्स का सेवन करती हैं।

डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारत में सप्लिमेंट्स के सेवन को लेकर कोई आकंड़ा मौजूद नहीं है। हालांकि उन्होंने माना कि उनके पास आने वाले करीब 40 पर्सेंट मरीज़ पुराने प्रस्क्रिप्शन के साथ आते थे, जिनमें ढेर सारे सप्लिमेंट्स लिखे होते थे।

फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टिट्यूट (Fortis Escorts Heart Institute) के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ और मैक्स साकेत में एन्डोक्रनालजी के डायरेक्टर डॉ. सुजीत झा ने भी सप्लिमेंट्स के बढ़ते इस्तेमाल के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘भारत में हेल्थ सप्लिमेंट्स को ड्रग नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें फूड सप्लिमेंट्स के तौर पर देखा जाता है और शायद इसीलिए उनका बढ़-चढ़कर प्रचार किया भी किया जाता है। इनमें से कुछ सप्लिमेंट्स का प्रचार हमारे बॉलिवुड स्टार्स भी करते हैं।’

एक्सपर्ट्स की मानें तो चूंकि ये सप्लिमेंट्स मेडिकल स्टोर या केमिस्ट काउंटर पर आसानी और ढेर सारी मात्रा में मिल जाते हैं, इसलिए लोगों को लगता है कि ये हमारी सेहत के लिए फायदेमंद हैं और ड्रग कंपनियां लोगों की इन्ही भावनाओं का गलत फायदा उठा रही हैं। उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि अगर वे मल्टी-विटामिन्स लेंगे तो कम थकान महसूस करेंगे और फिजिकली फिट रहेंगे।

रिपोर्ट्स की मानें तो भारत में nutraceutical industry यानी ये हेल्थ सप्लिमेंट बनाने वाली इंडस्ट्री का बिजनस करीब 2.2 मिलियन डॉलर है जबकि आहार संबंधी सप्लिमेंट्स 32 पर्सेंट मार्केट कवर करते हैं। एम्स में कार्डियोलॉजी के प्रफेसर डॉ. संदीप मिश्रा कहते हैं कि अब लोगों को आगाह किए जाने की ज़रूरत है कि वे ज़रूरत से ज़्यादा सप्लिमेंट्स न खाएं। ये तभी मदद कर सकते हैं जब किसी विटामिन या मिनरल की हमारे शरीर में कमी है, वरना इन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करना नुकसानदायक हो सकता है।

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