Saturday, December 7, 2019 2:21 AM
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उत्तर प्रदेश ने भी 1989 में देखा था महाराष्ट्र जैसा सत्ता का चरखा

लखनऊ। बॉलीवुड की धरती महाराष्ट्र के मुम्बई में शनिवार को सामने आए राजनीति के ‘फिल्मी क्लाइमेक्स’ को देख सब अवाक हैं। रात में सत्ता की सेज सजाकर सोया शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी गठबंधन शनिवार सुबह उठा तो सब उजड़ा पाया और भाजपा ने दांव से सरकार बना ली।

देश में सत्ता के ऐसे ही चरखा दांव की कहानी उत्तर प्रदेश के बूढ़े दिलों में अब भी जवां है। 1989 के विधानसभा चुनाव में जनता दल की जीत के बाद मुख्यमंत्री घोषित हो चुके अजित सिंह सपने संजोते रह गए और मुलायम सिंह यादव अपने दांव से सीएम बन गए।

प्रदेश में अस्सी के दशक में जनता पार्टी, जन मोर्चा, लोकदल अ और लोकदल ब ने मिलकर जनता दल बनाया। चार दलों की एकजुट ताकत ने असर दिखाया और उत्तर प्रदेश में करीब एक दशक के बाद विपक्ष ने 208 सीटों पर जीत हासिल की थी। 425 विधानसभा सीटों वाले प्रदेश में सरकार बनाने के लिए तब 14 अतिरिक्त विधायकों की जरूरत थी। मुख्यमंत्री पद के दो उम्मीदवार थे। लोकदल ब के नेता मुलायम सिंह यादव और दूसरे चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत की दावेदारी कर रहे उनके पुत्र अजित सिंह। चार पार्टियों के विलय से बने जनता दल की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए अजित सिंह का नाम तय हो चुका था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन अचानक फैसला बदला गया और जनमोर्चा के विधायक मुलायम सिंह के पाले में जा खड़े हुए और वह मुख्यमंत्री बन गए।

तब केंद्र में भी जनता दल की सरकार बनी। विश्वनाथ प्रताप सिंह तो देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे। यूपी में पार्टी की जीत के साथ ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि अजित सिंह मुख्यमंत्री होंगे और मुलायम सिंह यादव उपमुख्यमंत्री। लखनऊ में अजित सिंह की ताजपोशी की तैयारियां चल रही थीं कि मुलायम सिंह यादव ने उपमुख्यमंत्री पद ठुकरा कर सीएम पद की दावेदारी कर दी। तब प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने फैसला किया कि मुख्यमंत्री पद का फैसला लोकतांत्रिक तरीके से गुप्त मतदान के जरिये होगा। फिर जो हुआ, वह सूबे की रोचक राजनीति का एक बड़ा किस्सा है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय वीपी सिंह के आदेश पर मधु दंडवते, मुफ्ती मोहम्मद सईद और चिमन भाई पटेल बतौर पर्यवेक्षक आए। एक बार कोशिश की गई कि मुलायम उप मुख्यमंत्री का पद स्वीकार कर लें लेकिन, मुलायम सिंह इसके लिए तैयार नहीं हुए। मुलायम ने तगड़ा दांव खेलते हुए बाहुबली डीपी यादव की मदद से अजीत सिंह के खेमे के 11 विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया। इस काम में उनकी मदद बेनी प्रसाद वर्मा भी कर रहे थे।

सिर्फ पांच वोट से हारे अजित

मतदान का वक्त आया तो दोपहर में विधायकों को लेकर गाडिय़ों का काफिला विधानसभा में मतदान स्थल पर पहुंचा। विधायक अंदर थे और सारे दरवाजे बंद कर दिए गए। वहां बाहर कार्यकर्ताओं का हुजूम लगातार मुलायम सिंह यादव जिंदाबाद के नारे लगा रहा था। तिलक हॉल के बाहर दोनों नेताओं के समर्थक बंदूक लहरा रहे थे। मतदान में अजित सिंह मात्र पांच वोट से हार गए और मुलायम सिंह अचानक मुख्यमंत्री बन गए। पांच दिसंबर 1989 मुलायम ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

दल मिले थे, दिल नहीं

चार पार्टियों ने मिलकर जनता दल तो बनाया था लेकिन, नेताओं के दिल नहीं मिले थे। तत्कालीन कांग्रेस विधायक और खुलकर अजित सिंह का समर्थन करने वाले भूधरनारायण मिश्र बताते हैं कि दरअसल, डकैती उन्मूलन की नीतियों का मुलायम सिंह सिंह ने प्रबल विरोध किया था, जिसकी वजह से वीपी सिंह को पूर्व में मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा था। इस वजह से वह मुलायम को पसंद नहीं करते थे। इधर, चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत को लेकर अजित सिंह और मुलायम सिंह में खींचतान थी। महाराष्ट्र में भी गठबंधन में शामिल दलों के बीच राजनीतिक विचारधारा का आंतरिक टकराव जग जाहिर है।

कांग्रेस-राकांपा की तरह वीपी सिंह का था कच्चा मन

तत्कालीन कांग्रेस विधायक सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं कि वीपी सिंह ने अजित सिंह को मुख्यमंत्री कैंडिडेट घोषित तो कर दिया था, शायद वह पूरी तरह से उनके साथ नहीं थे। मुलायम सिंह ने दावेदारी कर दी। तब भी वीपी सिंह खामोश रहे और किसी विधायक से अजित सिंह को वोट देने की पैरवी नहीं की। इसी तरह महाराष्ट्र में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस ने भी शिवसेना के साथ सरकार बनाने का भरोसा दिया लेकिन सही समय पर फैसला नहीं कर सके।

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